सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

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योगः कर्मसु कौशलम्

कर्मसु कौशलम् के लिये योगाभ्यास

आज तक आपने सुना होगा "स्वास्थ्य के लिये योगाभ्यास", और यह सच भी है, आसन और प्राणायाम करने से शारीरिक स्वास्थ्य और उत्साह दोनों में लक्षणीय प्रगति होती है।

लेकिन अष्टांग योग हमारे समग्र अस्तित्व को ही निखार देता है।

आसन और प्राणायाम भी अष्टांग योग के ही दो अंग हैं। इन दो अंगों तक हमें सीमित नहीं रहना है, हमें अन्य छः अंगों से भी लाभ उठाना है।

मेरा यह प्रयास है कि हम सभी अंगों का समन्वय और उपयोग करने की विधी समझें और अविश्वसनीय से लगने वाले लाभ प्राप्त करें।

इन आठों अंगों की अपनी-अपनी महत्ता है और उनके प्रयोग का एक अनुक्रम भी है।

इन्हें ठीक-ठीक समझने के उपरान्त ही हम उनका समुचित प्रयोग कर सकते हैं। अतः हम इन अंगों को पहले भली भांति समझ लेते हैं।


पंच कोश विद्या योग की जननी है


योगांगों को समझने के लिये हम पहले उनका उद्गम समझेंगे।

मैं उस कालखंड की कल्पना करता हूँ जब योग विद्या का जन्म नहीं हुआ था। लेकिन तब भी हमारे पूर्वज एक श्रेष्ठ राष्ट्र और विश्वकल्याणकारी संस्कृति के निर्माण में लगे थे।


अपने इन प्रयासों में उन्होंने विज्ञान की गहनतम शाखाओं और उनके मानव कल्याण की दृष्टी से प्रयोग करने में अद्भुत सफलता प्राप्त की। इन उपलब्धियों की तुलना हम पश्चिमी राष्ट्रों की वर्त्तमान वैज्ञानिक उपलब्धियों से कर सकते हैं।


मैं अति भूतकाल के उस दिन की कल्पना कर रहा हूँ जब अचानक एक वैज्ञानिक ने मानव शरीर के अंतरंग में सूक्ष्म शरीर की प्रतीति की और अपने सहकर्मियों को भी इसका ज्ञान कराया।


यही वह दिन था जिसने एक अपूर्व अवसर हमारे वैज्ञानिकों को दिया और उनका एक बहुत बड़ा वर्ग इस नूतन दिशा में अनुसंधान करने में पूरी क्षमता से लग गया। शनैः-शनैः एक एक परत खुलती गई और सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम शरीरों की पहचान होने लगी, उनकी क्षमताएँ, उपयोग और प्रयोग पर कार्य आगे बढ़ने लगा।


सूक्ष्म शरीरों का परिचय होने पर स्थूल और सूक्ष्म का भेद प्रत्यक्ष हुआ तब स्थूल शरीर को नाम मिला अन्नमय कोश। यह शरीर माता के गर्भ में जन्म लेता है और माता जो अन्न ग्रहण करती है, वही उसके शरीर की निर्मिति का कारण बनता है। जब वह जीव गर्भ से बाहर आता है तब भी उसका शरीर अन्न के कारण ही बढता है, इसलिये इस स्थूल शरीर को अन्नमय कोश यह नाम दिया गया।


सर्व प्रथम सूक्ष्म शरीर है प्राणमय कोश, उससे सूक्ष्म शरीर मनोमय कोश, उससे भी सूक्ष्म शरीर विज्ञानमय कोश और सबसे सूक्ष्म शरीर आनन्दमय कोश कहलाया।


अन्नमय कोश के कण-कण में प्राणमय कोश व्याप्त होता है। उसी प्रकार प्राणमय कोश में मनोमय कोश, मनोमय कोश में विज्ञानमय कोश तथा विज्ञानमय कोश में आनन्दमय कोश पूर्णतः व्याप्त होता है।


जब इन कोशों का विस्तृत ज्ञान हुआ तब उस काल खंड के वैज्ञानिकों ने एक अत्यन्त महती निर्णय लिया। अब तक के उनके प्रयास अन्नमय कोश के स्वास्थ्य पर ही केंद्रित थे लेकिन अब उनके सामने चार अन्य कोशों का भी दायित्व आया।

उस दायित्व के निर्वाह में एक नये विज्ञान और ज्ञानशाखा का जन्म हुआ जो "योग" के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसे "योग" नाम इसलिये दिया गया क्योंकि इस विद्या में सभी पाँच कोशों का समन्वित विचार तथा अध्ययन करके इस संयुक्त शरीर के स्वास्थ्य के उपायों को निर्धारित करना था।


क्रमशः...


लक्ष्मण सखाराम करन्दीकर

पुणे

शुक्रवार, ५ जुलाई २०२४


योगः कर्मसु कौशलम्

कर्मसु कौशलम् के लिये योगाभ्यास -

पंच कोश

तैत्तिरीय उपनिषद में पाँचों कोशों का वर्णन मिलता है।

आज कोई वैज्ञानिक जब अनुसंधान करता है तब वह परिणामों और निष्कर्षों को अनुसंधान कर्ताओं की शीर्ष संस्था के सम्मुख प्रस्तुत करता है। ऐसे निष्कर्ष मान्य होने पर उन्हें संस्था के ग्रंथों में स्थान देकर प्रकाशित किया जाता है जिससे कि अन्य अन्वेषकों को लाभ हो सके और अनुसंधान और गहरे जा सके।


हमारे देश में सहस्रों वर्षों से यह प्रथा प्रचलित है। हर मूल्यवान मान्य हुए निष्कर्ष को हमारे उपनिषद आदि ग्रंथों में देखा जा सकता है।


वर्त्तमान संदर्भ में तैत्तिरीय उपनिषद के कुछ सारगर्भित अंश प्रस्तुत हैं। संपूर्ण तैत्तिरीय उपनिषद अवश्य पढ़ें।

यह उपनिषद पंचकोश विद्या को समर्पित है।


॥ श्री हरि ॥

॥तैत्तिरीयोपनिषद ॥

तृतीय वल्ली:

भृगु वल्ली

॥ अथ प्रथमोऽनुवाकः ॥

भृगुर्वै वारुणीः। वरुणम् पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवाच । अन्नम् प्राणम् चक्षुः श्रोत्रम् मनो वाचमिति। तम् होवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति ।

स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १॥

अर्थ

वारुणी वरुण के पुत्र भृगु अपने पिता वरुण से विनयपूर्वक बोले- हे भगवन! मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिये। इस प्रकार प्रार्थना करने पर, वरुणने उनसे यह कहा: अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन, और वाणी, इस प्रकार यह सभी ब्रह्म की उपलब्धि के द्वार हैं । इसके पश्चात वरुण ने भुगु से कहा, निश्चय ही यह सब प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा अन्त में इस लोक से प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैंउसको तत्त्व से जानने की इच्छा कर, वही ब्रह्म है । इस प्रकार अपने पिता की बात सुनकर, भृगुने तप किया।


'तप' शब्द का प्रयोग अथक अनुसंधान के लिये किया जाता है। आज हमारे सामने उदाहरण हैं इसरो की उपलब्धियों के, उन वैज्ञानिकों के तप से ही यह संभव हुआ।


तप करके भृगु अपने पिता से कहते हैं कि अन्न ही ब्रह्म है जिसे पिता स्वीकार नहीं करते और उन्हें पुनः तप करने का परामर्श देते हैं।

पुनः तप करके जब भृगु लौटते हैं तो पिता से कहते हैं कि प्राण ही ब्रह्म है। इसे पिता स्वीकार नहीं करते और पुनः तप करने का परामर्श देते हैं।

अब की बार भृगु लौटते हैं तब कहते हैं कि मन ही ब्रह्म है जिस बात को पिता अमान्य करते हैं और भृगु तप के लिये चले जाते हैं। इस बार जब वह लौटते हैं तब बडे उत्साह के साथ पिता से कहते हैं कि विज्ञान ही ब्रह्म है; पिता इसे भी अमान्य करते हैं और भृगु पुनः तप करने लगते हैं।

इस बार वह अत्यंत प्रसन्न अवस्था में लौटते हैं और घोषणा करते हैं कि आनन्द ही ब्रह्म है।


महात्मा भृगु ने किन-किन कारणों से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द को ब्रह्म कहा इसका वर्णन भी इस उपनिषद में अति पठनीय है।


मित्रों, अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द, यह पांच नाम कोशों को कैसे मिले इसका भी वर्णन तैत्तिरीय उपनिषद की ब्रह्मानन्द वल्ली में उपलब्ध है।


ब्रह्मानन्द वल्ली

इस उपनिषद की द्वितीय वल्ली जो ब्रह्मानन्द वल्ली कहलाती है उसमें कोशों का विस्तृत वर्णन है। चुने हुए अंशों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है।


सभी प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं तथा अन्न से ही बढ़ते हैं। यह सभी प्राणियों द्वारा खाया जाता है तथा यह भी सभी प्राणियों को खाता है – अपने आप में विलीन कर लेता है। इसलिए इसको ‘अन्न’ कहा जाता है।


उस अन्न-रसमय शरीर से इस स्थूल शरीर के अन्दर रहनेवाला प्राणमय एक और शरीर है, जिससे यह शरीर व्याप्त है सो यह प्राणमय आत्मा स्थूल शरीराकार ही है, उस स्थूल शरीर की आकृति के अनुसार ही यह प्राणमय आत्मा है।


यह निश्चति है की इस प्राणमय पुरुष से भिन्न, उसके अन्दर रहनेवाला एक और मनोमय आत्मा है, जिससे यह सम्पूर्ण प्राणमय शरीर व्याप्त है। यह मनोमय आत्मा निश्चय ही पुरुष के आकार का ही है। उसके पुरुष आकृति में व्याप्त होने से ही यह मनोमय आत्मा पुरुषके आकार का है।


यह निश्चित है कि उस पहले बताए हुए इस मनोमय पुरुष से भिन्न, उसके अन्दर रहनेवाला एक और आत्मा विज्ञानमय है। उस विज्ञानमय आत्मा से जिससे यह सम्पूर्ण प्राणमय शरीर व्याप्त है। यह विज्ञानमय आत्मा निश्चय ही पुरुष के आकार का ही है।उसके पुरुष आकृति में व्याप्त होने से ही यह विज्ञानमय आत्मा पुरुष के आकार का है।


उस विज्ञानमयी आत्मा के भी अंतर्यामी आत्मा वे ही परब्रह्म परमेश्वर हैं, जो पहले वालों के अर्थात अन्नमय शरीर के, प्राणमय तथा मनोमय पुरुष के हैं। यह निश्चित है की उस पहले बताए हुए इस विज्ञानमय जीवात्मा से भिन्न, उसके अन्दर रहनेवाला आत्मा आनंदमय, परमपिता परमात्मा है। यह विज्ञानमय परमात्मा भी सम्पूर्ण प्राणमय शरीर में व्याप्त है। यह आनंदमय परमात्मा पुरुष के समान आकार वाला ही है। उस विज्ञानमय के पुरुष आकृति में व्याप्त होने से ही यह आनंदमय परमात्मा पुरुषाकार कहा जाता है।


उपर्युक्त दोनों उदाहरणों में कोशों का वर्णन आध्यात्मिक दृष्टि से किया गया है।


आगे हम उन्हें योग के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे।


क्रमशः...


लक्ष्मण सखाराम करन्दीकर

पुणे

शुक्रवार, १० जुलाई २०२४